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What is Cloud computing with examples in hindi

What is Cloud computing with example in hindi

इस विशेष पोस्ट में हम Cloud Computing के बारे में सटीक उदाहरणों के साथ हर जानकारी साझा करेंगे। इस पोस्ट में हम क्लाउड कंप्यूटिंग की history, development और वर्तमान में इनकी Services इत्यादि सभी विषयों पर जानकारी साझा करेंगे।

Cloud computing का concept (संकल्पना) बहुत पुराना है। आज सिर्फ ये लोकप्रिय हुआ है उन निरंतर विकसित किए गए तकनीक के कारण, जो आज हमारी जरुरतों को पूरी करने की क्षमता रखते हैं।

आज हर क्षेत्र में तकनीक के विकास के साथ एक चीज की मांग सबसे ज्यादा बढ़ गई है वो है कम्प्यूटर आधारित विभिन्न सेवाओं व इनके स्टोरेज की। Cloud computing इन्हीं चीजों का समाधान है। यानी हमारा future अब Cloud Computing का होनेवाला है।

हम अक्सर Amazon web services (AWS), Microsoft’s Azure और Google cloud का नाम सुनते हैं अगर नहीं तो कम से कम इनकी सेवाओं जैसे Email, गूगल ड्राइव, फेसबुक इत्यादि Apps को या वेब आधारित सेवाओं का इस्तेमाल करते हैं। ये सभी Cloud कंप्यूटिंग के उदाहरण हैं। तो चलिए क्लाउड कंप्यूटिंग तकनीक से हम रूबरू होते हैं।

क्लाउड कम्प्यूटिंग क्या है (What is Cloud computing)?

Cloud computing मुख्य रूप से Computing के Resources का Internet पर Pay-as-you-go बेसिस पर On-demand delivery करना है।

Platforms और softwares होस्टिंग प्रोवाइडर द्वारा मैनेज किए जाते हैं। बेहतर security व performance के लिए Updates भी समय-समय पर hosting provider ही मैनेज करते हैं।

इसमें Physically आपको Server, Storage इत्यादि के लिए Hardware set-up की जरूरत नहीं पड़ती। अपने काम आप Internet के माध्यम से Virtual machines पर करते हैं।

आपके सारे data Cloud पर यानी Remote servers पर save होते हैं जो कभी भी कहीं से भी आपको Internet के माध्यम से accessible हैं।

Cloud computing में क्लाउड के servers का सेटअप एक जगह ना होकर अनेक जगहों जैसे US, China, Taiwan, Singapore यानी अलग-अलग जगहों पर होता है। जो कि Security, disaster में data loss से बचाव व विभिन्न locations पर users के ब्राउज़िंग अनुभव को बेहतर करता है व साइट के loading Speed को boost करता है।

जैसे मानलीजिये मेरी साइट के होस्टिंग का server अगर India में है तो Indian visitor के लिए ये तेजी से लोड होगा, जबकि अन्य देशों के visitors के लिए slow लोड होगा।

Cloud computing से मतलब ऐसा नहीं है कि बादलों में कहीं कुछ ऐसा है जहां हमारा डेटा स्टोर होता है, ऐसा बिल्कुल भी नहीं है।

इनके भी बड़े-बड़े Servers रूम होते हैं जो कुछ बसों के आकार से लेकर एक छोटे से गांव के बराबर हो सकते हैं। जहां ये हमारा डेटा स्टोर करके रखते हैं। हम बस उन्हें पैसे देते हैं, बाकी का काम उनका।

क्योंकि अगर हम अपने छोटे-छोटे कामों के लिए खुद के Servers इस्तेमाल करने शुरू करें तो इसमें खर्च और पावर ज्यादा आएगा और ये हमारे लिए अनुकूल नहीं होगा।

क्योंकि एक सर्वर स्थापित करने के लिए कई चीजों की व्यवस्था करनी होती है। ये अलग बात है कि आप अपने खुद के लिए भी एक सर्वर चाहें तो अपने कंप्यूटर का इस्तेमाल करते हुए 24×7 इंटरनेट से जोड़ कर बना सकते हैं लेकिन ये लंबे समय तक नहीं चलेगा।

लेकिन ये लोकप्रिय क्यों हुआ ? इसका जवाब हम एक example  के जरिए देंगे जो आपको अच्छे से जानने में मददगार साबित होंगे।

मानलीजिए आपको आज कहीं जाने के लिए संसाधन की आवश्यकता है, इसके लिए आपके पास तीन विकल्प हैं –

1• आप Bus से जाएं जिसमे बहुत सारे लोग होंगे जो अपने-अपने स्टॉप पर उतरेंगे और आपको परेशानी हो सकती है।

2• या फिर आप अपनी खुद की एक Car खरीद लें जिसमे सिर्फ आप मजे से कहीं भी आ जा सकते हैं लेकिन इसमें ये नुकसान है कि ये महंगी है और अधिकाँश समय बेकार पड़ी रहती है और Maintenance खर्च अलग।

3• तीसरा विकल्प है Taxi का जिसे जब चाहें इस्तेमाल करें व पैसे देकर टेंशन मुक्त हो जाएं। ना मेंटेनेंस ना ईंधन का झंझट।

अब आप किसे चुनेंगे— स्पष्ट रूप से Taxi का।

जी हां, इसी आईडिया से Cloud Computing की शुरुआत होती है। जिसे जब चाहें कहीं भी उपयोग करें और अपने इस्तेमाल के अनुसार भुगतान करें।

यानी Cloud computing हमारे लिए servers, datacenters, data backup, updates इत्यादि झंझटों से मुक्त होकर अपने मुख्य काम पर focus करने के लिए बेहतर है। यही कारण है कि दुनिया की 90% कंपनियां Cloud computing के Services का इस्तेमाल करती हैं।

क्लाउड क्या है (What is Cloud)?

Cloud से तात्पर्य उन असंख्य (Infinite) Interconnected Servers से है जो मिलकर Cloud बनाते हैं।

Cloud एक तरह से servers का विशाल जाल (netlike) है। इसमें कौन सा data किस server या किस Location से आ रहा है ये कोई नहीं जानता।

इसमें अनगिनत सर्वर्स एक दूसरे से जुड़े रहते हैं। अगर कोई server fail भी कर गया तो कोई फर्क नहीं पड़ता उसकी जगह अन्य सर्वर्स होते हैं।

जब भी information यूजर द्वारा cloud पर store की जाती है तो वो एक Remote server में स्टोर की जाती है। ये virtual servers, resources को जरूरत पड़ने पर physical hubs से वापस (Resource pooling) लेते हैं।
ये physical hubs ही असली (real) data centres हैं जो दुनिया में अलग-अलग विशेष जगहों पर कंपनियों द्वारा स्थापित किए जाते हैं।

क्लाउड कम्प्यूटिंग की परिभाषा (Definition of Cloud Computing)

Cloud computing मुख्य रूप से computing technology से संबंधित Resources का Internet के माध्यम से मांग के अनुरुप डिलीवरी करना है। इसमें आप उतना ही भुगतान करते हैं जितना कि संसाधन आप इस्तेमाल करते हैं।

Microsoft के अनुसार, “Cloud Computing मुख्य रूप से कंप्यूटिंग के साधनों का इंटरनेट (cloud) पर डिलीवरी करना है। जिसमें सर्वर्स, स्टोरेज, नेटवर्किंग, डेटाबेस, सॉफ्टवेयर व इंटेलिजेंस शामिल हैं। जो तेज, नवोन्मेषी व मांग के अनुसार विभिन्न सेवाएं प्रदान करता है।”

जबकि Amazon के अनुसार, क्लाउड कंप्यूटिंग IT संसाधनों का Internet पर मांग के अनुसार डिलीवरी करना है जिसके संसाधन की कार्यविधि ‘जितना उपयोग उतना भुगतान’ है।

ये Resources कंप्यूटिंग से संबंधित कुछ भी हो सकते हैं जैसे Servers, file Storage, web hosting, software and testing और development हेतु platform इत्यादि। नीचे हम इसके कुछ बेहतरीन Examples के बारे में जानेंगे।

क्लाउड कम्प्यूटिंग के उदाहरण (Examples of Cloud Computing)

Cloud based applications की लिस्ट काफी बड़ी है जिसमें से हम कुछ आपको बता रहे हैं जो आपके लिए भी काफी उपयोगी साबित होंगे।
Cloud computing का इस्तेमाल छोटे जॉब के Data processing से लेकर बड़े-बड़े Video games व Analysis तक में होती है।

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वैसे सामान्य तौर पर हम अधिकाँश Cloud based apps और सर्विसेज का ही अधिक इस्तेमाल करते हैं जैसे- Youtube, Facebook, Whatsapp, Emails,Twitter ये Social media apps या अन्य के रूप में हम सभी Cloud based सेवाओं का ही फायदा ले रहे हैं।
लेकिन चलिए हम कुछ और थोड़े अलग Apps के बारे में जानते हैं।

Adobe Creative Cloud (Spark post)

ये किसी भी यूजर के लिये जो Graphic design, Banners, photo graphy इत्यादि में बहुत ही useful है। जिसपर आप यूट्यूब, twitter, facebook, linkedin इत्यादि platforms के लिए banner बना सकते हैं वो भी फ्री में। आप चाहें तो Customized साइज में भी बैनर/फोटोज/प्रेजेंटेशन बना सकते हैं।

मुख्यतः इसमें कई एप्प्स एक साथ मिलकर काम करती हैं। जिनकी performance आपको चौंका देगी। ये सभी cloud based हैं। अपने डिज़ाइन online सेव कर डाउनलोड कर सकते हैं।
इस Adobe के मोबाइल एप्प का नाम Spark post है।इसका mobile app आप install कर इसे use कर सकते हैं। अधिकांश bloggers/vloggers इसी का Use करते हैं।

Canva
इसी ग्राफ़िक डिज़ाइन एप्प के क्रम में Canva का नाम भी है। ये भी Spark post के जैसे ही काम करता है, लेकिन Spark post का UI काफी बेहतरीन व आसान है। इस पर भी signup कर के अपने फोटोज को create व डिज़ाइन कर Cloud पर save कर सकते हैं।

Google Drive
इसका इस्तेमाल भी online storage के लिए किया जाता है। जो गूगल का बहुत ही पॉपुलर एप्प है। इसपर आप अपने photos, videos, Documents को ऑनलाइन स्टोर कर सकते हैं और शेयर भी कर सकते हैं। इसकी पूरी जानकारी के लिए हमारा पोस्ट पढ़ें।
Dropbox, Amazon S3 भी इसी तरह ऑनलाइन स्टोरेज सर्विस देता है जो कि Cloud based service हैं। इनपर आप अपने मोबाइल/कंप्यूटर के गुम हो जाने पर भी अपने contents भूलेंगे नहीं। किसी भी सिस्टम से लॉगिन कर आप उन्हें हासिल कर सकते हैं। एक निश्चित Capacity जे बाद आपको Extra space Purchase करना पड़ता है।

Digiboxx
भारत सरकार के NITI AYOG (नीति आयोग) द्वारा पेश किया गया भारत का अपना पहला Cloud storage service है जो गूगल ड्राइव से भी लगभग हर मायनों में बेहतरीन है। इसमें 20 GB तक कि free cloud storage है। जबकि गूगल ड्राइव के ₹130 के बदले सिर्फ ₹ 30 में आप 2 TB तक डेटा स्टोर कर सकते हैं।

यहां आप अपने फोटोज, वीडीयोज, डाक्यूमेंट्स इत्यादि को online share, transfer वो भी एक्सेस परमिशन्स के साथ कर सकते हैं। जो कि गूगल ड्राइव की भांति कुछ समय तक use न करने पर भी डिलीट नहीं होता बल्कि जब तक आप digiboxx से जुड़े रहेंगे तब तक आपके डेटा Save रहेंगे।

सबसे बड़ी बात ये की ये एक Indian startup है जो digital asset management के आत्मनिर्भरता के भारतीय मिशन को ध्यान में रखकर लाया गया है। ये डेटा को इंडिया में ही स्टोर करता है और पूरी सिक्योरिटी (SSL secured) के साथ। इसलिए हमें विदेशी तकनीक के अलावे भारतीय तकनीक को भी विशेष रूप से प्रोत्साहित करना चाहिए।

Microsoft office 365
इस application का इस्तेमाल आप अपने Office के works के लिए कर सकते हैं जो आपके data, spreadsheet, presentation, Scan, Transfer इत्यादि से लेकर अन्य महत्वपूर्ण कार्यों को आसानी से पूरा करने में सहयोग करता है।

क्लाउड कम्प्यूटिंग कैसे काम करता है (How does cloud computing work)?

Cloud Computing एक Application आधारित software Infrastructure है। जब भी हम कोई डेटा स्टोर करते हैं वो इनके remote servers पर store होते हैं न कि User के सिस्टम पर।

Remote servers पर stored होने के कारण डेटा को कहीं भी और कभी भी Internet के माध्यम से Access किया जा सकता है। इनको समझने के लिए मुख्य रूप से हम इन्हें two parts में Divide कर सकते हैं।
1• Front-end
2• Back-end

Front-end वो portion है जिन्हें User (Client side) देखता है। इसका काम computer network के उस application को हैंडल करना है जिससे through, Cloud network Connect होता है। इसमें Web-based या application-based कनेक्शन्स के लिए अलग अलग Interfaces होते हैं लेकिन सभी Cloud compute में एक जैसे User-Interface (UI) नहीं होते।

जबकि Back-end में Cloud computing के वो तंत्र आते हैं जो एक साथ connect होकर Cloud को बनाते हैं जैसे Servers, Databases and Central servers जो computing services के लिए होते हैं।

Cloud computing में Central server, Middleware software का Use करके उन सभी Devices/Computers के बीच निर्बाध Connectivity को बनाए रखता है जो Cloud computing system से Connected हैं। इस तरह सभी सिस्टम आपस में मिलकर काम करते हैं।

Cloud computing में सभी aplications के लिए अलग-अलग server होते हैं।

Cloud computing में Central server एक निश्चित Protocol के तहत अपने सभी operations चलाता है। Protocols एक तरह के set-of-rules होते हैं।

Computer devices या अन्य कोई छोटी से छोटी devices जैसे USB डेटा स्टोरेज, Drives या अन्य downloading वगैरह सभी चीजें Protocol के तहत ही files की लेन-देन या transfers करते हैं।

Cloud computing में Clients के data की double-copy यानी duplicate कॉपी भी store की जाती है। मतलब ये की हर clients के जरूरत के हिसाब से cloud servers को double space की जरूरत होती है ताकि किसी data loss, data breach, disaster या अन्य खतरों के नुकसान से बचा जा सके।
Store किए गए Data को backup के रूप में copy बनाने को Redundancy कहते हैं।

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क्लाउड कंप्यूटिंग के प्रकार (Types of cloud computing)

Cloud computing एक बड़ा क्षेत्र है जो कई तरह की services क्लाइंट्स के लिए उपलब्ध कराता है। इन्हें हम Deployment basis पर और Service basis पर दो भागों में बांटते हैं।
Traditionally तरीकों में Companies को Server, hardware, software व maintenance वगैरह का सेट- अप खुद ही करना पड़ता था जिसमें खर्च के साथ-साथ data loss का risk भी बना रहता था। लेकिन अब Cloud computing के कारण सबकुछ On-the-go हो गया है।

1- Service Model
2- Deployment Model

इन दो भागों के भी अलग-अलग उपभाग हैं जैसा कि आप नीचे Diagram में देख सकते हैं।

Service models and Deployment models of Cloud computing

Service models of Cloud computing

IaaS (Infrastructure as a Service)

IaaS Service में User को Vendor (विक्रेता) की तरफ से Computing resources के रूप में Server, storage और networking की सुविधा मिलती है। बाकी की चीजें जैसे Software, platforms यूजर का होता जो Vendor के Infrastructure में अपने काम करता है।

इसमें यूजर को hardware (IaaS) पर Investment नहीं करना पड़ता, इसतरह उसके कार्य आसान, तेज व कम कीमत पर होते जाते हैं।

Server, data storage व Networking के चीजों को Physically सेटअप करने में बहुत ज्यादा Investment करना पड़ता है। उसके बाद IT के specialist को रखना जिसमें Data backup, Security, Software update, System maintenance इत्यादि का झंझट अलग।

लेकिन Virtually (आभासी) यूजर को IaaS के माध्यम से ये सभी Accessible है। वो भी pay-as-you-go basis पर।

एक बार फिर यहां स्पष्ट कर दूं कि ये सभी resources User द्वारा online होता है। User को कुछ भी अपने computer पर Save करने की जरूरत नहीं होती। यानी ये Over the Internet delivery है। जैसे हम google drive या youtube पर अपनी फाइल्स, डाक्यूमेंट्स या वीडियो सेव व शेयर करते हैं। लेकिन यहां पर कुछ और विस्तृत कार्य किए जाते हैं।

IaaS की विशेषताएं

• यूजर कोई भी Physical set-up करने की बजाय Virtual set-ups के माध्यम से अपने कार्य करता है।

• Infrastructure यूजर के workload के हिसाब से flexible व Scalable होते हैं, यानी जरूरत के हिसाब से इन्हें आसानी से कम या Extend किया जा सकता है।

• सभी चीजें Cloud पर store होने के कारण User के task Secure होते हैं कुछ भी Failure होने का अवसर नहीं होता।

• किसी कारण Disaster या System break होने पर भी User के data loss होने का खतरा नहीं होता।

PaaS (Platform as a Service)

इस प्रकार के सर्विस में Vendor की ओर से यूजर को एक ऐसा Cloud Environment (Platform) Provide कराया जाता है जिसमे यूजर अपने Applications को Develop कर उनकी Testing के साथ-साथ उनकी Delivery भी सुनिश्चित करता है।

इसमें यूजर की तरफ से Application Code की जरूरत होती है जो कि PaaS के Environment में इस्तेमाल कर यूजर App को Develop, Test व host करता है।

जबकि Backups, Security, Server software इत्यादि Vendor संभालता है। इनकी विशेषताएं निम्न हैं –

• PaaS एक Platform उपलब्ध कराता है जिसमें Inbuilt tools होते हैं जिनकी सहायता से उपभोक्ता Apps को Develop, test और host करता है साथ ही Delivery भी। वो भी एक ही Environment से।

• PaaS User या Organizations को ये सुविधा उपलब्ध कराता है कि वो Infrastructure set-up इत्यादि जैसी जटिल कार्यों पर ध्यान देने के बजाय अपने Project और Development पर focus कर सके।

• PaaS में Vendors उपभोक्ता को Computing Systems Remotely access करने में भी Collaborate करते हैं।

• Security, Operating system, Backups जैसे जटिल कार्य खुद Vendors की तरफ से किए जाते हैं। इससे user को अन्य कार्यों पर focus करने में मदद मिलती है।

SaaS (Software as a Service)

जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है कि इस प्रकार की Offering में User को Vendor की तरफ से Software applications Offer किए जाते हैं।

जो Organizations या Enterprises के लिए On-demand या आम लोगों की जरूरत के हिसाब से विकसित किए गए होते हैं। ये अधिकांश Subscription basis पर आसानी से मिल जाते हैं।

Softwares के पीछे की सभी चीजें जैसे कि Updating, Maintenance, Security इत्यादि Vendor संभालता है। यूजर को बस app को इस्तेमाल करना होता है।

SaaS की विशेषताएं

• On demand application software की डिलीवरी।

• Subscription basis पर apps की उपलब्धता।

• System break या अन्य कारणों में data loss की संभावना नहीं।

• Services किसी भी Internet enabled Smartphone, computer इत्यादि पर उपलब्ध।

जैसे (Example)- Gmail, Google drive या WIX

Deployment models of Cloud computing

इसके अंतर्गत 4 निम्न Category हैं-
• Public cloud
• Private cloud
• Community cloud
• Hybrid cloud

Public cloud

Cloud deployment model में सबसे पॉपुलर और common मॉडल है Public cloud. इसकी services सभी Users के लिए Same (समान) व लगभग free होती हैं। Example- Facebook, Twitter, Google इत्यादि।

Public cloud जो है उसकी सभी Services same server network पर Run करती हैं। इसकी cloud सर्विसेज का supplier third party होता है और Professional cloud provider होता है।

Public cloud का Infrastructure व set-up ज्यादा Complex नहीं होता है, क्योंकि उसे एक ही टाइप की सर्विस को देना होता है। Public cloud को वो कंपनियां ज्यादा पसंद करती हैं जो Users के Privacy व personal Information को लेकर उतनी सीरियस नहीं होती जितनी कि Banking सेक्टर।

हालांकि यूजर को खुद भी नहीं पता होता कि उसकी व्यक्तिगत सूचनाएं कहां व किसके पास Store हो रही हैं। ये पब्लिक क्लाउड की खामियों में गिना जाता है।

Private Cloud
Private Cloud एक निजी फर्म की जरूरत और secure environment के लिए इस्तेमाल की जाने वाली सेवा है। इसके ऑपरेशन्स में Legacy applications कार्य करते हैं जो Public cloud प्लेटफार्म पर नहीं चल सकते हैं।
इसके data centres की सर्विसेज सिर्फ एक ही company/organization के लिए होती है।

Private cloud में owner company का इसके सभी चीजों जैसे Service Integration, Rules व इसके सभी operations पर नियंत्रण होता है।

कभी कभी इसके Offer में Vendor की तरफ से पूरे hardware तक का सेट-अप On-the-premise दिया जाता है या फिर Externaly। प्राइवेट क्लाउड को कम्पनी के जरूरत के हिसाब Infrastructure में customization किया जा सकता है। इसके इंफ्रास्ट्रक्चर को विशेष रूप से डिज़ाइन किए Private network पर ऑपरेट किया जाता है।

बेहतरीन नियंत्रण व Secure environment के कारण Private cloud अन्य के मुकाबले costly होता है। Private cloud deployment model को Internal या corporate model भी कहा जाता है।

Community Cloud
ये सर्विस एक समूह (Group of users) को Private रूप से आपस में Connect होने व एक दूसरे से data sharing करने के काम आती है।

मतलब ये की community cloud में Private cloud इस्तेमाल होता है चूंकि इसके Resources का कई समूहों के द्वारा इस्तेमाल व भुगतान की जाती है इसलिए ये प्राइवेट क्लाउड होकर भी सस्ता पड़ता है।

कम्युनिटी क्लाउड high cost (महंगा) होता है Public cloud deployment model के मुकाबले व Scalability व flexibility यानी जरूरत के हिसाब से resources को कम ज्यादा करने की सुविधा नहीं होती। इसमें Storage व bandwidth fixed यानी पहले से ही तय होते हैं उससे ज्यादा आप नहीं इस्तेमाल कर सकते।

Hybrid cloud
Hybrid cloud model दो या दो से अधिक विभिन्न Infrastructures का combination है।
जिसमें (Public cloud, Private cloud, community cloud etc.) सभी अलग-अलग systems एक ही यानी Same Architecture में उपयोग किए जाते हैं इसे ही hybrid cloud कहते हैं।

अब आप सोचेंगे कि ऐसा क्यों? तो ऐसा इसलिए कि कुछ data ऐसे होते हैं जिन्हें कंपनियां Public cloud पर नहीं store कर सकती क्योंकि ये Illegal यानी गैरकानूनी होता है। सरकारें ऐसा करने से मना करती हैं।

यहां तक कि हमारे व आपके या फिर किसी कंपनी की Critical data या Private data भी Private cloud पर store होता है, जबकि less critical यानी कम संवेदनशील डेटा Public cloud पर store होता है।

क्लाउड कम्प्यूटिंग के फायदे (Advantages of Cloud Computing)

वैसे क्लाउड कंप्यूटिंग के तो अनेक फायदे हैं जिसका प्रमाण वो 90% कंपनियां हैं जो आज Cloud की Services पर चलती हैं। जरा सोचिए आज हम कितनी आसानी से अपने blogs/websites, Applications को चला लेते हैं।

हम कितनी आसानी से अपने photos, Banners, Presentations, Animations को मिनटों में बना लेते हैं। ये सभी Cloud computing के कारण सम्भव है।

मतलब की आनेवाला समय यानी हमारा Future अब Cloud Computing का होने वाला है। तो चलिए इनके फायदे जानते हैं-

• Cost- सबसे महत्वपूर्ण इनका cost efficiency का होना है यानी कीमत पर इनकी उपलब्धता।

• Back-up and Restore- Cloud पर stored डेटा कभी भी, कहीं से भी internet enabled डिवाइस से Back-ups और Restore किया जा सकता है।

• यूजर जब चाहे तब इनकी सर्विसेज को जरुरत के हिसाब से बढ़ा सकता है Pay-as-you-go बेसिस पर।

• Easy to use- इनकी सेवाओं को आसानी से अपने सिस्टम पर Implement कर सकते हैं। वो भी किसी भी location से। ये उपयोग करने में भी आसान होती हैं।

• No IT staff- Cloud services के इस्तेमाल में आपको सभी चीजें Virtualy मिलती हैं इस तरह physicaly आपको कोई भी बड़ा सेट-अप नहीं करना पड़ता और नाहीं उसके लिए IT के स्टाफ को रखना पड़ता है।

• Unlimited storage- Cloud computing में आपको हार्ड ड्राइव, स्टोरेज full होने की चिंता नहीं होती।

• Data security– हालांकि Cloud providers की तरफ से best security standards को Implement करने के दावे किए जाते हैं, फिर भी data breaching की आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता।

क्लाउड कम्प्यूटिंग की कमियाँ
(Disadvantage of Cloud Computing)

दुनिया दो चीजों वाली है यानी हर एक का जोड़ा इस तथ्य से Cloud computing भी अछूता नहीं है। इसलिए अब हम इसके दूसरे पहलू के बारे में जानेंगे।

• No Internet no data– जी हां Cloud से आप data तभी Retrieve (वापस पा लेना) कर सकते हैं जब तक कि आपके Device में Internet connectivity है।

• Limited control– जैसा कि सभी जानते हैं क्लाउड की सेवाएं Service Provider के हाथ में है। उसी के द्वारा Manage व Monitor की जाती हैं। इसतरह यूजर के हाथ मे functions को लेकर कोई Control नहीं होता।

• Technical Issues- यदि सर्विस प्रोवाइडर के Offerings (IaaS, PaaS, SaaS) में कोई भी Issue सामने आता है तो User उसमें कुछ नहीं कर सकता। आपको technical support के लिए phone calls पर निर्भर होना पड़ेगा।

• Downtime- Cloud services चूंकि Internet based सेवाएं हैं इसलिए Downtime से भी इंकार नहीं किया जा सकता। 2019 के जून-जुलाई महीने में ही Google, Amazon, Reddit, Cloudflare इत्यादि बड़ी कंपनियों की सेवाओं तक को Outage का सामना करना पड़ा था।

• Vulnerability to attack- Cloud चूंकि एक online service है और Publicaly उपलब्ध है। इसलिए इसपर hackers की नजर भी होती है जो आपके डेटा को breach कर सकते हैं।
इसके लिए आपको सबसे बेहतर service provider जैसे AWS, Microsoft azure, Google cloud जैसे सर्विस प्रोवाइडर का चुनाव करना चाहिए या फिर dedicated hosting service provider अच्छे होते हैं।

History of Cloud Computing
क्लाउड कम्प्यूटिंग का इतिहास

क्लाउड कंप्यूटिंग के इतिहास को जानने के लिए हमें उस समय के हालात व विकासक्रम को जानना होगा जिसकी शुरुआत होती है 1950 के दशक से। भले ही ये popular 21st शताब्दी में हुआ लेकिन इसके तकनीक व  Ideas दशकों पुराने हैं। आईए जानते हैं इसके Evolution (विकासक्रम) के बारे में।

Distributed computing (1950s)

आधुनिक कंप्यूटिंग की नींव (Base of modern computing) Distributed computing के समय से कहा जाता है। ये सिस्टम्स अपने कार्य को कई sub-services में बांट कर अलग-अलग सिस्टम्स को distribute कर देते थे। इस तरह ये task को पूरा करते थे।

इनके भी सिस्टम्स भारी भरकम होते थे और किसी भी कार्य को करने के लिए इनके सभी सिस्टम्स का एक जगह पर होना अनिवार्य था। यही इनकी सबसे बड़ी drawback (कमी) थी।

Cloud computing, कंप्यूटिंग के क्षेत्र में निरंतर दशकों से हो रहे तकनीकी विकास का नतीजा है। 1951 के दशक में पहला Commercial computer UNIVAC प्रथम आया जो U.S में 159,000 $ में बिका था।

1960-70s में जब Large-scale Mainframe computers अस्तित्व में आए जिनकी high-volume processing power थी। तभी से लोगों के मन मे resources को शेयरिंग करने की अवधारणा जन्म लेने लगी थी। Mainframe computers 1960-1970 के मध्य IBM ने लाया था।

Large-scale Mainframe computers वो थे जिनकी Processing power बहुत ज्यादा थी इनके hardware parts भी बहुत बड़े थे। इनकी कीमत भी उस समय millions में थी। ये large amount के data को भी बहुत fast process करते थे।

चूंकि सिस्टम्स पहले तो काफी महंगे होते थे जो की हर किसी के रखने की बस की बात नहीं थी। लेकिन बहुत महंगे खरीदकर सिस्टम को खाली रखना भी रिसोर्सेज की बर्बादी थी।

तभी Time sharing की थ्योरी अपनाई जाने लगी यानी कि resources pooling की मतलब ये की एक ही सिस्टम के रिसोर्सेज (CPU power, Storage etc.) को यूजर इस्तेमाल करने लगे। ऐसा Dumb terminal की सहायता से यूजर करते थे।

Dumb terminal का काम बस इतना था कि वो central computer को Mainframe का access दिलाता था।

कोई भी यूजर किसी भी एक Terminal के माध्यम से अपने कार्य कर सकता था। इस समय महंगे Maintenance cost, expensive systems जैसी समस्याओं ने Shared access की तरफ ध्यान आकर्षित किया। जिससे लोग resources को sharing करने लगे।

क्लस्टर कम्प्यूटिंग (Cluster computing)

यहां Cluster से मतलब group of Servers से है जो मिलकर एक single system के रूप में खुद को दर्शाते हैं। यही Cluster कंप्यूटिंग है।

इन्हें उच्च क्षमता वाले कम्प्यूटर फ्रेमवर्क भी कहते हैं। क्योंकि ये Complex यानी जटिल गणनाओं में इस्तेमाल किए जाते हैं क्यों कि इनकी data processing speed काफी high होती है।

Cluster computing में बहुसंख्य सर्वर्स (multiple Servers) मिलकर एक single System के रूप में कार्य करते हैं।
इसमें किसी task को करने के लिए सिस्टम high availability पेश करता है जिससे कि downtime नहीं होता या फिर कम से कम होता है।
आज Cloud computing में भी improvements के साथ Cluster computing के आधार पर ही servers कार्य करते हैं।

1970s

जैसे जैसे समय गुजरता गया resources को sharing करने की परिकल्पना रंग लाई और लोगों के मन मे VMware की कल्पना जोर पकड़ी और नतीजतन Virtual machines का आगमन हुआ।

ये VMware एक तरह का visualization software था। जबकि visualized network उस visual को कहते हैं जिसमे विभिन्न nodes से जुड़े नेटवर्क को हम देखते हैं यानी नेटवर्क को Graph के रूप में दर्शाना।

DEC कंपनी ने इस दशक में minicomputers लाई यानी पहले के बड़े कंप्यूटर्स में सुधार करके साइज को कम किया गया साथ ही यहीं से C,C++ programming language की शुरुआत की।

ये टेक्नोलॉजी एक क्रांति साबित हुई और कंप्यूटर टेक्नोलॉजी व कॉम्युनिकेशन तकनीक को और विकसित करने की होड़ भी लगने लगी।

Hypervisors

Hypervisor को VMM यानी Virtual machine monitor भी कहते हैं। ये host computer को ये क्षमता प्रदान करता है की वो अपने Resources share करके अनेक Guest Virtual machines (VMs) को Support करे।

एक ही Physical hardware के रिसोर्सेज को कई अन्य operating systems को उपयोग करने देने की क्षमता अब Hypervisors के माध्यम से होने लगी।

ये hypervisors एक तरह के software थे। जो एक ही सिस्टम के CPU, Storage, Processor cores, RAM इत्यादि चीजों को कई हिस्सों में बांट (Partition) देते थे।

hypervisors का काम उस एक मुख्य सिस्टम से जुड़े अन्य सभी ऑपरेटिंग सिस्टम के लिए मुख्य सिस्टम के Resources का अलग-अलग CPU, storage, RAM वगैरह का allot (आवंटन, बँटाई) कर देना था।

इनकी खास बात ये थी और है कि अगर कोई एक ऑपरेटिंग सिस्टम में कोई खराबी आ जाती थी तो उससे जुड़े बाकी के अन्य सिस्टम्स पर इसका कोई असर नहीं पड़ता।

1990s

इसी क्रम में Intel ने लाया PCs (Personal computer) को, जो काफी बड़ा बदलाव साबित हुआ जिसमें कंप्यूटर्स के motherboard, chips इत्यादि छोटे हुए।

इसी दौर में Microsoft ने windows OS (ऑपरेटिंग सिस्टम) लाया जो एक क्रांतिकरी कदम साबित हुआ, आज दुनिया के लगभग 80% कंप्यूटर्स इसी OS पर चलते हैं।

Visualization के बढ़ते तकनीकी विकास के क्रम में 1990 के दशक में कई कंपनियों ने Private visualized network के सर्विसेज को लोगों के लिए ऑफर करने लगीं।

लेकिन 1990 के शुरुआत में जो connection कंपनियां देती थीं वो single dedicated data connection होता था। लेकिन इस तकनीक में कंपनियां shared access देने में असमर्थ थीं।

इसी दशक में (1990-1996) Grid computing की तकनीक भी आई जो Parallel networking environment में कंप्यूटर सिस्टम पर सुपर कंप्यूटर की तरह कार्य करती थी।

इसमें कई सिस्टम parallel तरीके से connected होकर कार्य करते थे।

Technology व hypervisors के उपयोग व विकास के फलस्वरूप कंपनियां उन लोगों को सर्विसेज देनी शुरू कीं जिनके पास hardware infrastructure नहीं थे या वे इतना खर्च afford या वहन नहीं कर सकते थे।

लोगों को shared access जैसे individual कनेक्शन देने, hypervisors में improvements व उन्हें मैनेज करने की तकनीकी विकास व Pay-as-you-go (Meterized service like SaaS) जैसी सुविधा यहीं से विकसित और शुरू हुई और यहीं से cloud computing ने इंटरनेट की दुनिया में पांव जमा दिए।

हालांकि “Cloud computing” शब्द के निर्धारण का जिक्र 1996 में Compaq computer corporation के एक document में किया गया। जबकि इसके Concept को 1996 में Pentagon के Information processing techniques जो कि ARPANET Division का हिस्सा था, के पहले director J.C.R Licklider ने किया था।

इसी बीच 1999 में Salesforce कंपनी ने CRM (Customer relationship management) नाम का software लाई जो कंपनियों जो आज के cloud computing technology को मैनेज, रन करने और सफल बनाने में काफी सफल हुआ।
1995-2000 के मध्य CISCO ने IP networks का Concept लाया और बाद में Tim Berners-Lee के www के खोज के बाद दुनिया इंटरनेट से जुड़ गई।

Cloud computing की लोकप्रियता तब अचानक से बढ़ गई जब 2006 में Amazon ने AWS (Amazon web services) की शुरुआत की और EC (EC2) यानी Elastic compute cloud, और Simple storage service को Launch किया।

इसी क्रम में गूगल ने 2008 में google app engine लाया इसके बाद microsoft ने भी microsoft azure लाया और Cloud computing को लोगों के लिए आसान कर दिया।

अभी तक हमने Cloud computing के विकासक्रम यानी Evolution of Cloud computing को जाना। चलिए कुछ और बेहतर जानते हैं।

क्लाउड डिप्लॉयमेंट (मेघ परिनियोजन) क्या है (What is Cloud deployment)?

Cloud deployment एक architecture होता है जिसके अंतर्गत Virtual computing environment तैयार किया जाता है।
इसमें Service models के तीनों models (IaaS, PaaS, SaaS) में से किसी एक का set-up किया जाता है।
इसी model पर cloud systems को Implement किया जाता है।

ये मॉडल क्लाउड सिस्टम के क्रियान्वयन (Functionality) के लिए एक तरह से Access control, security protocol, management etc. लागू करते हैं जिसके अंतर्गत cloud systems चलते हैं।

दोस्तों, उम्मीद है ये पोस्ट पढ़कर आपको कुछ न कुछ बेहतर जानकारी मिली होगी। हमने अपनी तरफ से पूरी कोशिश की है कि पाठक बिना कुछ सीखे ब्लॉग से वापस न जाए। फिर भी कोई कमेंट/सुझाव हो तो आप हमें कमेंट बॉक्स में जरूर लिखें। हम हर कमेंट का उत्तर जल्दी से जल्दी देने की कोशिश करेंगे।

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