Home Blog Satellite क्या है ये अंतरिक्ष में कैसे कार्य करता है? पूरी जानकारी

Satellite क्या है ये अंतरिक्ष में कैसे कार्य करता है? पूरी जानकारी

Satellite kya hai ye kaise kaam karta hai

Satellite की सेवाएं आज हमारे दैनिक जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुकी हैं।

भारत ने ISRO द्वारा बनाया पहला आर्यभट्ट satellite 19 अप्रैल 1975 को सोवियत संघ के kapustin var राकेट से अंतरिक्ष मे भेजा।

आज भारत इस क्षेत्र में अनेक रूपों में कीर्तिमान स्थापित कर चुका है।

फिर चाहें वो एक साथ 104 satellites को सफलतापूर्वक ऑर्बिट में स्थापित कर विश्व रिकॉर्ड  हो या सबसे कम बजट में space mission को अंजाम देना हो या फिर अंतरिक्ष मे चक्कर लगाती किसी भी satellite को मार गिराना हो।

भारत का पहला Private satellite tv चैनल ZEE TV ने 1992 में जब मनोरंजन जगत में satellite की सेवाओं का उपयोग करना शुरू किया तो उसके बाद इस क्षेत्र में होड़ सी लग गई।

इस पोस्ट में हम satellite व उसके अंतरिक्ष में कार्यप्रणालीयों के बारे में विस्तृत जानकारी साझा करेंगे। चूंकि ये क्षेत्र बड़ा व तकनीकी पहलूओं से भरा है इसलिए हम इसे अलग अलग हैडिंग्स में बांट कर इसके बारे में जानेंगे।

Satellite क्या है?

दोस्तों, Satellite यानी उपग्रह उस ऑब्जेक्ट या मशीन
को कहते हैं जो अंतरिक्ष में किसी अपने से बड़े ऑब्जेेक्ट या ग्रह की परिक्रमा करता है।

जैसे चांद हमारी धरती की परिक्रमा करता है इसलिए वो धरती का उपग्रह हुआ, जबकि धरती सूर्य का और सूर्य सभी ग्रहों के साथ आकाशगंगा का चक्कर लगाता है। 

मतलब ये की कोई भी पिंड अगर ऑर्बिट में चक्कर लगा रहा है तो उसे उपग्रह कहा जा सकता है।

जबकि इंसानों द्वारा बनाए गए satellites को Artificial satellites (कृत्रिम उपग्रह) कहते हैं।

धरती की कक्षा में कोई भी satellite पृथ्वी के चारों ओर गोल-गोल ना घूम कर अंडाकार पथ पर (Oval)  चक्कर लगाता है।

Satellite का निर्माण अनेक कार्यों को ध्यान में रखते हुए किया जाता है। इसतरह उसके काम के हिसाब से उसमे अलग-अलग components जैसे कैमरे, सेंसर्स इत्यादि भी लगाए जाते हैं।

Satellites को Rocket या Space shuttle के माध्यम से लांच किया जाता है।

जैसा कि आपको पता होगा कि धरती की Escape velocity (पलायन वेग) 11.2 km./second है।
इस हिसाब से एक राकेट का इतनी तीव्र गति से ऊपर उठना वो भी 11.2km/sec. जो कि आगे बढ़ने पर होती है ओर लगातार बढ़ती ही जाती है। अपने आप मे बड़ी बात है।

क्या आपने सोचा है कि Satellites कभी भी Meteroits यानी उल्कापिंडों से क्यों नहीं टकराते? दरअसल सभी सैटेलाइट्स को प्रोग्राम किया गया होता है कि वो आनेवाली Meteroits से बच निकलें।

हालांकि अमेरिका और रूस के सैटेलाइट्स फरवरी 2009 में Colloid यानी टकरा गए थे। जोकि सम्भवतः सॅटॅलाइट इतिहास में पहली घटना थी।

Satellites धरती पर किसी भी वाहन के मुकाबले सबसे अधिक energy efficient होते हैं।

चूँकि धरती से जितनी ऊंचाई हम तय करते जाते हैं Oxygen का स्तर कम होता जाता है, इसलिए अत्यधिक ऊंचाई पर satellite के Rocket engine को Fuel के साथ Oxidizer भी ले जाना पड़ता है जिसे Propellant कहते हैं।

वैसे तो एक उपग्रह में उसके काम के हिसाब से बहुत सारे कंपोनेंट्स होते हैं, लेकिन कुछ चीजें लगभग समान होती हैं जिनके बारे में हम आगे जानेंगे।

Satellites के Parts व उनके कार्य

सबसे पहले हम जब satellite की तस्वीर को देखते हैं तो हम पाते हैं कि वो gold foil में लपेटा गया होता है।

लेकिन असल में ये गोल्ड का नहीं बल्कि Polyamide या Polyester coated एक Multilayer एल्युमीनियम film होती है।

इसे satellite की सुरक्षा के लिए लपेटा जाता है, क्योंकि सफर के दौरान satellite को -150℃ से +250℃ तक का तापमान (temperature) झेलना पड़ता है।

Satellite को ऊर्जा सूर्य से मिलती है जो उसके बगल में लगे Solar panel पर रोशनी पड़ने पर उसमे Photovoltaic क्रिया होती है।

जिससे DC करंट बनता है जो बैटरियों में संचित होता है। इसको सॅटॅलाइट में मौजूद इन्वर्टर AC करंट में बदल देता है, जिससे satellite के कंपोनेंट्स काम करते हैं।

लेकिन satellite के सोलर पैनल वाले डैने हमेशा सूर्य की ओर रहें इसके लिए Sun-sensor का इस्तेमाल होता है। Sun-sensor सॅटॅलाइट के डैनों को सॅटॅलाइट के घुर्णन गति के हिसाब से सूर्य की ओर रखता है।

ऑर्बिट में चक्कर लगाते हुए अगर सॅटॅलाइट कभी ऑर्बिट से थोड़ा भी विचलित होता है तो उसे वापस ऑर्बिट में लाने के लिए सॅटॅलाइट में thrusters लगे होते हैं जिनमे ईंधन के रूप में Methyl hydrazine या Tetraoxide होता है, ये fire कर के वापस उसे ऑर्बिट में ले आते हैं।

ये सभी नियंत्रण धरती पर स्थित Ground station से Computer द्वारा नियंत्रित होते हैं। जहां पर Satellite की speed, position व thrusters को धरती से लगातार संपर्क स्थापित कर Track किया जाता है।

यहां आपके मन में एक प्रश्न उठा होगा की क्या और क्यों satellite अपने ऑर्बिट से de-orbit होते हैं।

तो ऐसा इसलिये सम्भव है कि सॅटॅलाइट पर लगने वाला गुरुत्वाकर्षण बल सभी जगह समान नही होता इसका कारण सूर्य और चंद्रमा के बल हैं ही लेकिन इसमें धरती का Mass distribution का सभी जगह एक तरह का न होना है।

धरती का गुरुत्वाकर्षण बल धरती के Mass (भार) के कारण है।

क्योंकि धरती का घनत्व कही अधिक तो कहीं कम है और आपको पता है कि ग्रह के गुरुत्व बल में Mass (Mass – एक तरह से हम इसे भार कह सकते हैं) का मुख्य रोल होता है।

इसी कारण सॅटॅलाइट अपने ऑर्बिट से कभी कभी थोड़ा भटक जाता है।

सॅटॅलाइट मिशन की सफलता व इसके कार्य, दूरी का अनुमान इत्यादि कार्यों में जटिल गणितीय गणनाओं के अलावा समय का सबसे ज्यादा महत्व होता है।

इसके लिए इनमे Atomic clock का उपयोग होता है जो सबसे सटीक समय की जानकारी उपलब्ध कराती है।

Satellite को signals Receive व transmit करने के लिए इसमें Reflector Antenna लगा होता है।

जो Earth से satellite की तरफ Beemed up किए गए Signals को जिसे Uplinking कहा जाता है उसे Transponders के पास Input के रूप में भेज देता है।
Transponders इन इनपुट्स को प्रोसेस कर इनकी Frequency चेंज करते हैं व इनमे Noise को हटाते हुए इन Signals को Amplify करते हैं।

इनकी frequency में बदलाव इसलिए किया जाता है ताकि मशीन में ये Confusion ना पैदा करें कि uplink व downlink की कौन सी फ्रीक्वेंसी है।

जब data को धरती पर स्थित Ground station पर भेजा जाता है, जहां से इसे हमें Broadcaste कर दिया जाता है। इस प्रक्रिया को Downlink कहा जाता है।

Different Types of Satellites

धरती की कक्षा में अनेकों तरह के सॅटॅलाइट हैं लेकिन इनके विशेष कार्य के आधार पर इनको हम अलग-अलग नामों से जानते हैं। आईए जानते हैं इनके कार्य व नाम के बारे में।

  • जो सॅटॅलाइट Planets और Galaxy के बारे में अध्ययन के लिए भेजा जाते हैं उन्हें Astronomical satellite कहते हैं।
  • आजकल विभिन्न Devices जैसे फ़ोन, इंटरनेट, टेलीविजन इत्यादि को Access करने के लिये भी हमें Communication satellite की जरूरत पड़ती है।
  • मोबाइल में आप तमाम तरह के Maps को ब्राउज करते हैं वैसे ही समुंदर में नाविक रास्ता व दिशा जानने के लिए जिन तरीकों का उपयोग करता है वो सभी डेटा Navigation satellite से मिलती हैं।
  • कुछ उपग्रह सैन्य सेवाओं व खुफिया कार्यों के लिए भेजे जाते हैं जिन्हें Reconnaissance satellite कहते हैं।
  • शायद आपने Bio-satellite के बारे में नहीं सुना हो, ये सैटेलाइट्स जीवित जीवों, सूक्ष्म जीवों को स्पेस में अध्ययन व प्रभाव के बारे में शोध कार्यों हेतु अपने साथ ले जाते हैं।
  • कुछ सॅटॅलाइट Radiation, Magnetic field इत्यादि तरह के साइंटिफिक कार्यों को अंजाम देती हैं इसीलिए इन्हें Scientific satellites कहते हैं।
  • इसी तरह पृथ्वी के अध्ययन खासकर जलवायु व वातावरण संबंधी अध्ययन के लिए Earth observatory satellites काम मे आती हैं।

Orbit क्या है?

Orbit दो बलों Centrifugal force व Gravitational force का एक संतुलित क्षेत्र होता है।

यहां पर एक force तो forward की ओर लगता है जिसे Centrifugal force कहते हैं।

जबकि दूसरा अंदर यानी ग्रह के केंद्र की ओर लगता है जिसे Gravitational force कहते हैं।

अक्सर हमें सुनने को मिलता है कि अंतरिक्ष मे खासकर हमारे ISS (International space station) जो हमारी धरती से महज 400 किमी. की उंचाई (Altitude) पर है, वहां गुरुत्वाकर्षण बल शून्य है।

लेकिन ऐसा नहीं है वहां भी गुरुत्वाकर्षण बल है जो धरती की अपेक्षा 10% कम यानी फिर भी 90% है।

लेकिन ऐसा free fall होने के कारण व ISS के लगातार तीव्रगति से चक्कर लगाने के कारण उन्हें महसूस नहीं होता।

कहने का मतलब, वो भी लगातार गिर रहे होते हैं लेकिन उपर्युक्त चित्र की भांति centrifugal force व gravitational force के कारण वे ISS के साथ Orbit में चक्कर लगाते हैं।

LEO, MEO, HEO earth orbits

पृथ्वी के चारों ओर मुख्यतः 3 तरह की कक्षाएँ (Orbits) हैं। जिसमे सैटेलाइट्स धरती की परिक्रमा करते हैं।

  •  Low Earth Orbit
  • Medium Earth Orbit
  • High Earth Orbit

जो सॅटॅलाइट धरती के जितना करीब होगा उसे उतनी ही तीव्र गति यानी high speed से चक्कर लगाना होगा अन्यथा वो गिरते हुए पृथ्वी के वायुमंडलीय घर्षण से जल जाएगा।

Low earth orbit

ये धरती से 400 से 2000 किलोमीटर की ऊँचाई पर स्थित है। जो धरती का सबसे नजदीकी ऑर्बिट है।

• यहां गति करने वाले सैटेलाइट्स की स्पीड 25000 km/घंटे से अधिक होती है।

Example- अगर आप एक बाल्टी में पानी लेकर उसे गोल – गोल यानी 0° के वृत पर तेज गति से घुमाएंगे तो पानी नहीं गिरेगा। मतलब ये की घूमाने की गति को तेज रखना होगा, वरना गति कम होगी तो बाल्टी व पानी नीचे गिर जाएगा।

• यही कारण है कि धरती के काफी नजदीक होने पर Gravitational force अधिक होता है ऐसे में अगर गति कम होगी तो satellite नीचे गिरकर खत्म हो जाएगा।

•जबकि gravitational force कम होने पर गति कम होगी, यानी धरती उसे अपनी ओर ज्यादा ताकत से नहीं खिंचेगी।

Advantage and Disadvantage of Low Earth Orbit (LEO)

• धरती से कम ऊंचाई पर होने के कारण इन सैटेलाइट्स को high Bandwidth मिलती है, और Latency कम होती है।

• Latency का मतलब डेटा को भेजने और प्रोसेस होने में लगने वाला समय है। ये जितना कम होगा उतना बेहतर होगा।
इसे Milli second में मापा जाता है इसे Ping rates भी कहते हैं।

• यानी ये large data का Earth से आदान-प्रदान आसानी से करते हैं। Altitude (ऊंचाई) कम होने के कारण यहां तक पहुंचने के लिए satellites को कम ईंधन की जरूरत होती है।

• ISS (International space station) इसी कक्षा में है। यहां चक्कर लगाने वाले satellites में Spy satellites (जासूसी सैटेलाइट्स), व Communication satellites, और Earth की Observation करने वाली सैटेलाइट्स होती हैं।

• कम दूरी पर होने के कारण ये satellites धरती के एक large parts को नहीं Observe कर सकते।

• Earth से कम Altitude होने के कारण ये सैटेलाइट्स जल्दी ही खराब होने लगते हैं।

• LEO में satellites को deorbit होने का चांस ज्यादा होता है। यानी इसपर ज्यादा रखरखाव व Monitoring की जरूरत पड़ती है।

• LEO में काफी satellites हैं और लगातार लांच भी किए जा रहे हैं जिसके कारण यहां Space Debris अधिक हो गई हैं जो कभी भी किसी भी satellites से टकराकर उसे नष्ट कर सकती हैं।

Space debris उन्हें कहते हैं जो orbit में अब non functional machines या उनके Parts (टुकड़े) हैं जो लगातार चक्कर लगा रहे हैं।

• ये टुकड़े आपस में टकराकर Space junk यानी अन्तरिक्ष में मलबे का रूप के चुके हैं।

• इन टुकड़ों को हटाने व तबाह करने के लिए वैज्ञानिकों ने Obsolete spacecraft capture and removal (OSCR) नामक मशीन बनाने पर काम कर रहे हैं। (As today August 2020).

Medium Earth Orbit

ये orbit LEO के बाद यानी 2000 किमी. से शुरू होकर Geosynchronous ऑर्बिट यानी 35,786 किलोमीटर के कुछ नीचे खत्म होता है।

ये ऑर्बिट सबसे लंबा ऑर्बिट है। इसका भी काफी ज्यादा इस्तेमाल होता है, और इसके ऑर्बिट की टाईमिंग काफी भिन्न हो सकती है क्योंकि इसकी लंबाई यानी गैप ज्यादा है।

इसके मध्य में अगर कोई satellite चक्कर लगाता है तो वो 12 घंटे में पृथ्वी का एक चक्कर पूरा कर लेता है।
जबकि इसी ऑर्बिट में कहीं 8 तो कहीं 23 घण्टे भी लगते हैं।

ये ऑर्बिट Communication, GPS (Global positioning system 20,000 से 21,000 km के मध्य), या अंतरिक्ष के वातावरण में रिसर्च के लिए ज्यादा उपयोग होता है।

ये Geostationary Orbit के नीचे स्थित है। यहां पर वो सैटेलाइट्स जो North pole व South pole को कवर करते हैं वो इसी कक्षा में चक्कर लगाते हैं।

इस कक्षा में Telstar जो पहला और बहुत ही प्रसिद्ध प्रायोगिक सॅटॅलाइट (Experimental satellite) है वो भी इसी ऑर्बिट में है।
जहां LEO के सैटेलाइट्स को 90 मिनट लगते हैं अपनी एक चक्कर के लिए वहीं MEO में 12 घंटे लगते हैं।

MEO में 2 तरह के मुख्य Orbit हैं पहला Molniya ऑर्बिट जो Highly elliptical यानी दीर्घ वृताकार है। मतलब ये 90° के पथ पर चक्कर लगाता है यानी Pole से Pole.

जबकि दूसरा Sun-synchronus orbit (सूर्य के समकालिक कक्ष) है ये Circular (वृताकार) पथ है। यानी 0° पर चक्कर लगाता है।

Advantage and Disadvantage of Medium Earth Orbit

यहां Van allen belt नाम का एक जोन है जो इंसानों के लिए काफी खतरनाक है, वो इसलिए की यहां Radiation काफी ज्यादा है।

इसके चलते इंसान यहां कुछ नहीं कर सकता जबतक की हमे उचित तकनीक नहीं मिल जाती यहां ठहरने के लिए, फिर चाहे वो आदमी हो या मशीन।

इस बेल्ट से आप high-speed से गुजर सकते हैं लेकिन रुक नहीं सकते।

Radiation से बचाने के लिए ही वैज्ञानिक Radiation hardened electronics तकनीक इस्तेमाल करते हैं। जो मशीनों को रेडिएशन से बचाता है।

ये ऑर्बिट Geosynchronous के मुकाबले कम दूरी पर है जिससे यहां setallite को लांच करने में कम खर्च आता है और गैप व बैंड भी अधिक मिलता है।

यहां चक्कर लगाने वाले सैटेलाइट्स की इलेक्ट्रानीक पार्ट्स को अच्छी तरह से shielding करनी पड़ती है। जिसमे कई धातुएं लगाकर परत दर परत शील्ड कवर किया जाता है ताकि रेडिएशन से बचाव हो सके जबकि LEO में ऐसा नहीं होता।

High earth orbit
(Geostationary & Geosynchronous Orbit)

धरती की केंद्र से 35,786 km.के मध्य के ऑर्बिट को ‘Sweet spot‘ के नाम से जाना जाता है। यही High earth orbit है। इसे Geosynchronous orbit कहते हैं।

क्योंकि इस ऑर्बिट के satellite पृथ्वी के समान गति से चक्कर लगाते हैं। पृथ्वी 23 घंटे 56 मिनट 4.090 सेकंड में अपना एक चक्कर पूरा करतीहै। इसीलिए हर 4 साल पर हम leap year (अधिवर्ष) में 1 दिन को जोड़ते हैं।

क्या आपने कभी सोचा है कि आप अपने घर के television के dish को घुमाते नहीं बल्कि एक जगह फिक्स करके कैसे टीवी प्रोग्राम का आनंद लेते हैं।

ये सब कमाल है Geostationary orbit में घूम रहे satellite की। जो कि पृथ्वी के Equator (भूमध्य रेखा) की सीध में एकदम Static यानी स्थिर होता है।

ये ऑर्बिट बहुत ही पतली ऑर्बिट है जिसमे सैटेलाइट्स को भेजने के लिए होड़ लगी रहती है।

चूंकि ये पृथ्वी के ऊपर हमेशा स्थिर होता है इसलिए TVs के लिए या फ़ोन्स (Communication) के लिए ये सबसे उपयुक्त जगह होता है।

कमाल की बात है कि जिस भी देश के ऊपर ये satellites होते हैं उन देश के नक्शे के एरिया के हिसाब से उतनी Bandwidth उस देश की होती है।

मतलब की जापान छोटा एरिया कवर करता है तो उसको उसके नक्शे के ऊपर का आसमान उसका है अगर किसी दूसरे देश के व्यक्ति को उसके बैंडविड्थ में कोई satellite लांच करनी हो तो वो अमेरिका से नहीं बल्कि जापान से पूछेगा।

Geosynchronous orbit थोड़ा सा Ellipticl होता है यानी हल्का सा नार्थ और साउथ पोल की तरफ।

ये satellite अगर दिन में किसी जगह पर दिखेगा तो अगले दिन भी उसी समय वहां पर दिखेगा।

जबकि Geostationary satellite में ऐसा नहीं होता वो हमेशा स्थिर रहता है Earth के सीध में। कहने का मतलब ये की अगर आप Geostationary ऑर्बिट से Earth को देखेंगे तो पृथ्वी घूमती हुई नहीं दिखेगी।

क्योंकि वो पृथ्वी के समान गति से पृथ्वी का चक्कर लगाता है।

Graveyard orbit 

जब किसी satellite के कार्य की समयसीमा यानी Operational life खत्म हो जाती है तो उसकी गति को बढ़ाकर Geosynchronous orbit से थोड़ा दूर Graveyard orbit में पहुंचा दिया जाता है।

इससे वो अन्य ऑपरेशनल satellites से colloid होने से बच जाता है।

High earth orbit के बाद Graveyard orbit आता है। ये ऑर्बिट HEO से कुछ सौ किलोमीटर ही दूर लगभग (300 किमी.) है ।

इसे junk orbit, disposal orbit इत्यादि नामों से भी जाना जाता है।

जब कोई उपग्रह या अन्य उल्कापिंड धरती की ओर बढ़ते हैं तो पृथ्वी के ऊंचाई पर वायुमंडल में पिंड के तीव्र गति के कारण एक घर्षण बल (Friction) होता है क्योंकि सूर्य के गर्मी के कारण गैसें गर्म होकर उसे ऊपर की ओर धकेलती हैं।

इसी धकेलने से friction काफी ज्यादा होता है ऊपर से पिंड की गति भी लगभग 28,000 km/घण्टे होती है, फलस्वरूप पिंड जलकर राख हो जाता है।

बड़े सैटेलाइट्स को वैज्ञानिक South pacific ocean (दक्षिण प्रशान्त महासागर) में गिरा देते हैं जो इंसानों की आबादी से बहुत बहुत दूर है, इसे ‘Cemetery of Spacecraft’ यानी उपग्रहों का कब्रिस्तान भी कहते हैं।

उपग्रह के बारे में विकिपीडिया पर पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें।

मित्रों! अगर हमारी ये पोस्ट आपको ज्ञानवर्धक लगी हो और पसंद आई हो तो इसे सोशल मीडिया व अन्य प्लेटफॉर्म्स पर अवश्य शेयर करें। 

Content Protection by DMCA.com

1 COMMENT

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here